आवाज़-ए-हिन्द

मेरे हिम्मत को सराहो मेरे हमराह चलो, मैंने एक दीप जलाया है हवाओं के खिलाफ.

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समाजिक सरोकार और ब्लाग

Posted On: 12 Apr, 2012 Others में

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सामाजिक सरोकार के दूध में आम जनता की आवाज़ के शक्कर को मिलाकर बनाई गई चाशनी को यदि ब्लाग कहा जाता है तो यह ब्लाग भी अपनी अतिवाद की ओर जा रहा है जिस तरह पीत पत्रकारिता ने पत्रकार जगत को आम जनता से दूर सत्ता के करीब पहुँचा दिया, कहीं ऐसा न हो कि अतिवाद ब्लाग जगत को भी भटका दे। क्योंकि सिक्के के दो पहलू होते हैं हम एक पहलू को ही सच मान ले और दूसरे पहलू पर चर्चा ही न करें तो ऐसे में सरोकार की बात कहीं गुम होती दिखाई पड़ रही है। ब्लाग आम जनता के दिल की आवाज़ है, जिसमें कृत्रिमता का लेस मात्र भी ब्लागर और पत्रकार के बीच की बारीक रेखा को समाप्त कर सकता है। पत्रकार जो हमेशा सनसनीखेज खबर लिख कर अपनी टीआरपी / विज्ञापन को बढाने के लिए प्रयासरत रहता है। जबकि ब्लागर को मौन प्रशंसा पाने में संतोष ढुंढना चाहिए।
वास्तविक जीवन में भी योग्य और परिश्रमी लोग भावनाओं में बह कर अतिवाद के शिकार हो जाते हैं। जो अपने आपको काम की भट्टी में निरंतर झोंकते रहते हैं परिणाम स्वरुप जीवन का आनंद कहीं गुम हो जाता है। आप समाज में चिनगारी बनकर मत गुजरिए जिसकी आग समाज को ही जलाकर खाक कर दे। जलना है तो दीपक की तरह जलिए जिससे रौशनी फैले।
विपरीत मानसिकता के बावजूद एक ही विचार को सच का लबादा ओढाए रखने की चाहत हर लेखक में होती है जो कि बेहद मुश्किल काम है और इस कोशिश की कोई मंजिल भी नहीं,यही जीवन का कड़वा सच है। किसी एक विचार को सर्वमान्य से अलग परिवर्तनशील विचार को महाभारत में लिखकर वेद व्यास जी ने दुनियाँ के सामने बेहतरीन उदाहरण प्रस्तुत किया है जिसमें हर तरह के विचार और तमाम रिश्तों के उलझनों से उत्पन्न परिस्थितियों का बड़ी खूबसूरती से वर्णन किया है। महाभारत का सार है,मनुष्य हमेशा दो कुरुक्षेत्र के बीच लड़ता है पहला कुरुक्षेत्र स्वयं कि अंतरआत्मा और दूसरा जीवन। इसी प्रकार के द्वंद्वयुद्ध से लड़ते ब्लागर इस मंच पर विचारों के रुप में नजर आ जाएंगे। कुछ लोग भाग रहें हैं जबकि ब्लागर को अपने ब्लाग को शक्कर की तरह समाजिक सरोकार के दूध में घोल कर शर्बत की तरह परोसना चाहिए, डर तो बस यह है कि कहीं ब्लागर अपने अतिवाद के अम्ल से समाजिक सरोकार के दुध को ही न फाड़ दे।

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30 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

akraktale के द्वारा
January 12, 2013

भाई रशीद जी सादर,बहुत दिनों बाद आपका मंच पर आना हुआ है.कारण भी निचे पढ़ ही लिया है. आपका भी वही हाल है जैसा की सभी चाह रहे हैं की दंड कठोरतम हो.यह भी सही है की सश्रम कारावास की सजा दी जाए किन्तु भाई साहब यह देश जो लोग चला रहे हैं उनके बारे में कौन नहीं जानता, वे लोग कब इनकी सजा माफ़ कर देंगे कहा नही जा सकता इसलिए ऐसे लोगों कोमेरे विचार से मृत्युदंड दिया जाना ही उचित है वह किस तरह का हो इस पर अवश्य ही विचार किया जा सकता है.सादर.

dineshaastik के द्वारा
April 20, 2012

आदरणीय  अब्दुल जी सच  कहा आपने कि पढ़े लिखे लोग  भी यह सब कर रहे हैं। लेकिन  मित्र  यह केवल  हिन्दू धर्म  में ही नहीं हो रहा है, सभी धर्मों में हो रहा है। किन्तु हिन्दु धर्म  में तमाम  बुराईयाँ  होने के बाद  एक  बहुत  ही बड़ी अच्छाई है,  कि हम  उसकी आलोचना कर सकते हैं। जबकि इस्लाम  धर्म  जैसे कुछ  धर्मों में यह  एक  गुनाह  समझा जाता हैं। मेरा मानना है कि आलोचना का अधिकार न देना भी एक  गुनाह  ही है। मेरा मानना  है कि धर्म  हमारी एकता का सबसे बड़ा वाधक  तत्व है, धर्म  हमें उकसाता कि मंदिर  तोड़ों, मस्जिद  तोड़ो। धर्म  हमें दूसरे धर्म  की हिंसा करने के लिये उकसाता है, धर्म  केवल  अपने हित  देखता है। उसका राष्ट्रीय  हितों से कोई  सरोकार नहीं। प्रत्येक  शादी के रजिस्ट्रेशन  के विरोध  का आधार  धर्म, क्या आपको नहीं लगता यह  देश  की एकता और  विकास के लिये बहुत ही नुकसानदेह है। हम केवल  धर्म  और जाति का हित  देखते हैं, राष्ट्रहित नहीं। क्यों…….??????????? आदरणीय राशिद जी आपकी अगली पोस्ट पर प्रतिक्रिया नहीं जा रही है इसलिये या लिखना पढ़ रहा है। इसके लिये क्षमा चाहता हूँ।

surendr shukl bhramar5 के द्वारा
April 15, 2012

समाज में चिनगारी बनकर मत गुजरिए जिसकी आग समाज को ही जलाकर खाक कर दे। जलना है तो दीपक की तरह जलिए जिससे रौशनी फैले। मनुष्य हमेशा दो कुरुक्षेत्र के बीच लड़ता है पहला कुरुक्षेत्र स्वयं कि अंतरआत्मा और दूसरा जीवन। इसी प्रकार के द्वंद्वयुद्ध से लड़ते ब्लागर इस मंच पर विचारों के रुप में नजर आ जाएंगे। कुछ लोग भाग रहें हैं प्रिय रशीद जी अच्छी रही व्याख्या आप की ..सटीक है ..सार्थक है ..जिसमे जनहित हो आनंद हो ..उसे ही अपनाया किया जाय तो ठीक है चाहे भागो जहां रहो जहां करिए सार्थक .. भ्रमर ५

Bhupesh Kumar Rai के द्वारा
April 14, 2012

रशीद जी नमस्कार, बहुत अच्छा लिखा है आपने कि जलना है तो दीपक की तरह जलिए,जिससे रोशनी फैले.अच्छे विचार.

    अब्दुल रशीद के द्वारा
    April 14, 2012

    आदरणीय भूपेश जी सादर प्रणाम प्रोत्साहन और स्नेह के लिए शुक्रगुजार है हम

dineshaastik के द्वारा
April 14, 2012

आदरणीय राशिद जी, आपके आलेख  में एक  शब्द आया द्वंद युद्ध। मैं इसका अर्थ  हेगेल  के द्वंदवाद  के सिद्धांत  के परिपेक्ष  में लेना चाहूँगा। जिसके अनुसार प्रत्येक  विचार या सिद्धांत  की तीन  स्थितियाँ होती हैं। पक्ष, पतिपक्ष  तथा संपक्ष। सर्वप्रथम  कोई कोई व्यक्ति एक  विशेष  विचार या सिद्धांत  प्रस्तुत करता है इसके पश्चात  कोई अन्य व्यक्ति उस  विचार अथवा सिद्धांत का खंडन करके उसके विरोध  में सिद्धांत  प्रस्तुत  करता है। इन  दोनों को क्रमशः पक्ष  तथा प्रतिपक्ष  कहा जाता है। अंततः एक  अन्य  व्यक्ति उक्त  विरोधी सिद्धांत का समन्वय  करके एक  नवीन  सिद्धांत  प्रस्तुति करता है। जिसे संपक्ष कहा जाता है, यह संपक्ष  अपने पूर्ववर्ती पक्ष  तथा प्रतिपक्ष  दोंनो का समन्वित  रूप  होने के कारण  उसकी अपेक्षा अधिक  व्यापक  और संतुलित होता है। प्रत्येक  विचार की उपयोगिता इसीसे सिद्ध  होती है कि उनमें आंशिक  सत्य  अवश्य  विद्यमान  है और वह अधिक   व्यापक  और संतुलित  नवीन  विचार  की उत्पति  में सहायक  होता है।    यह  सिद्धांत  प्रचीन  काल  से लेकर आज  तक  चरितार्थ  है और शायद यह  नियम  ब्लॉग  पर भी  लागू होता है। आपका ब्लॉग  पढ़कर नवीन  विचारों से अवगत  हुआ   इसके लिये आपका आभार.. एवं सराहनीय  आलेख  के लिये बधाई…..

    अब्दुल रशीद के द्वारा
    April 14, 2012

    आदरणीय दिनेश जी सादर प्रणाम आपका मार्गदर्शन मिलता रहा तो यकीनन लेख में सुधार आता रहेगा. आपने हमारे विचार को अन्य रुप में परिभाषित कर बहुत कुछ समझा दिया आपकी प्रतिक्रिया और स्नेह का इंतजार रहेगा शुक्रिया

jlsingh के द्वारा
April 13, 2012

रशीद भाई, नमस्कार! आपने अपना सही विचार रखा है और वेद्ब्यास जी का उदहारण भी अच्छा पेश किया है. वेद्ब्यास जी ने महाभारत या वेद में हर तरह के विचारों का समावेश किया था, वह भी सभी विद्वानों की सहमति से! यह मंच भी हर तरह के विचारों का उद्गम स्थल है, विचारों के ही कारन हम एक दुसरे के करीब आते जाते हैं. विचारों का आदान प्रदान इस मंच पर भलीभांति हो रहा है. ऐसा मुझे लगता है. बीच बीच में कुछ हलके फुल्के ब्लोग्स भी मन को खुश कर जाते हैं. आपकी बेहतरीन प्रस्तुति का आभार!

    अब्दुल रशीद के द्वारा
    April 14, 2012

    आदरणीय जवाहर जी सादर प्रणाम आप हमारी बात से सहमत हुए यह हमारे लिए बेहद खुशी कि बात है आपका प्यार और प्रोत्साहन हमें उर्जा देता है बेहतर लिखने के लिए शुक्रिया

April 13, 2012

यह तो सच है, की ब्लॉग एक बड़ी आवाज़, और अवसर है. और इस अवसर का दुरूपयोग भी होता है कहीं-कहीं.. पर जिसकी जैसी समझ होगी, जैसी स्वीकृति होगी, वह तो उसी रस्ते ही चलेगा न! बस इतनी कोशिश रहनी चाहिए, की सही आवाज़ पूरी शिद्दत से उठती रहे, ताकि यह अवसर बेकार न हो सके.. सादर.

    अब्दुल रशीद के द्वारा
    April 14, 2012

    टिम्सी मेहता जी नमस्कार बस इतनी कोशिश रहनी चाहिए, की सही आवाज़ पूरी शिद्दत से उठती रहे, ताकि यह अवसर बेकार न हो सके..और समाज हित में हम अपनी आवाज़ बुलंद करते रहे स्नेह और प्रतिक्रिया के लिए बेहद शुक्रगुजार है हम

shashibhushan1959 के द्वारा
April 13, 2012

आदरणीय रशीद भाई, सादर ! समुद्र कि लहरों को कोई आकर नहीं दिया जा सकता ! अभी कुछ – अभी कुछ ! हार्दिक धन्यवाद !

    अब्दुल रशीद के द्वारा
    April 14, 2012

    आदरणीय शशी जी नमस्कार बेशक समुंद्र की लहरों को आकार नही दिया जा सकता लेकिन सुनामी के कहर को नजर अंदाज करना क्या ठीक रहेगा स्नेह और प्रतिक्रिया के लिए धन्यवाद

alkargupta1 के द्वारा
April 13, 2012

राशिद जी , मुझे लगता है यहाँ बहुत से ब्लॉगर्स ऐसे हैं जो बिना किसी तर्क वितर्क के ही अपने लेखन को निरंतर गति दे रहे हैं……. यहाँ अम्ल और शक्कर भी विचारणीय है

    अब्दुल रशीद के द्वारा
    April 14, 2012

    आदरणीय अल्का जी सादर प्रणाम आपने मेरे लेख का सही सार चंद लफ्जो में बता दिया शुक्रिया आगे भी आपके प्रोत्साहन का हमें इंतजार रहेगा

rekhafbd के द्वारा
April 13, 2012

रशीद जी ,आपने सही लिखा है ,समाज में दीपक की तरह रौशनी के लिए जलना चाहिए न की चिगारी से ही समाज को जला कर ख़ाक करना चाहिए,लेकिन कभी कभी ,कही कही चिगारी भी चमक की भी जरूरत होती है |बढ़िया आलेख

    अब्दुल रशीद के द्वारा
    April 14, 2012

    आदरणीय रेखा जी सादर प्रणाम आप की बात से सहमत हूँ लेकिन कभी कभी चिंगारी……….. बेहतर लिखने और कमियों को दूर करने में सहायक होती है प्रतिक्रिया स्नेह और प्रतिक्रिया के लिए धन्यवाद

चन्दन राय के द्वारा
April 13, 2012

रशीद साहब , जैसा की आपका आलेख सुंदर है , पर कुछ महानुभावो द्वारा जो प्रशन उठाया गया है , वो उचित या अनुचित में ये तो नहीं कन्हुंगा पर इतना कह सकता यदि इसे और विस्तृत रूप में लिखते तो सभी को अपने प्रश्नों के उत्तर मिल जाते , घम्भीर मुद्दा है और लिखीय साहब

    अब्दुल रशीद के द्वारा
    April 14, 2012

    चंदन जी सादर नमस्कार आपके प्रोत्साहन और स्नेह के लिए तहे दिल से आपका शुक्रिया

nishamittal के द्वारा
April 13, 2012

राशिद जी अर्काताले जी से सहमत हूँ ,पांचो अंगुलियाँ बराबर नहीं होती.आपने सभी को एक ही श्रेणी में लाकर पटक दिया है.जबकि जागरण मंच पर ऐसे भी महानुभाव है,जो शायद बिना किसी मोह माया के प्रतिदिन लिखते हैं.

    अब्दुल रशीद के द्वारा
    April 14, 2012

    आदरणीय निशा जी सादर नमस्कार किसी को आहत करना मेरे लेख का यह कतई मकसद नही हाँ आपने जो सवाल उठाए हैं उसका जवाब भी हमारे लेख में ही है. आप जैसे गुणी लोगों के स्नेह और प्रतिक्रिया रुपी मार्गदर्शन से कुछ लिख पाता हूँ. स्नेह और प्रतिक्रिया के लिए धन्यवाद

akraktale के द्वारा
April 13, 2012

राशिद भाई नमस्कार, मुझे लगता है सबको एक ही डंडे से हांक दिया है जो मुझे उचित नहीं जान पड़ता.हां अब अम्ल की खटास या कोई कडवाहट की बात कहो तो अवश्य विचारणीय भी है. आभार.

    अब्दुल रशीद के द्वारा
    April 14, 2012

    आदरणीय अशोक जी सादर नमस्कार मै कौन होता हूँ सबको एक ही डंडे से हाकने वाला. लिखने का मकसद मात्र इतना है की हम इस नायाब मंच पर भाषा की गरिमा बनाए रखते हुए मंच का मर्यादा कायम रखे. आपका सहयोग हमे मिलता रहा है आगे भी आपके स्नेह और प्रतिक्रिया का इंतजार रहेगा. स्नेह और प्रतिक्रिया के लिए शुक्रगुजार है हम

ajaydubeydeoria के द्वारा
April 12, 2012

सहमत.

    अब्दुल रशीद के द्वारा
    April 14, 2012

    अजय जी नमस्कार स्नेह और प्रतिक्रिया के लिए शुक्रगुजार है हम

vikramjitsingh के द्वारा
April 12, 2012

रशीद भाई, सलाम, ‘पत्रकार बनाम ब्लोगर’ अब तो ब्लोगिंग में भी ‘जहर’ घुलता जा रहा, ek ब्लोगर को दूसरा ‘फूटी आँख’ नहीं सुहाता… बहुत बढ़िया आलेख है, आपका…..

    Rajkamal Sharma के द्वारा
    April 12, 2012

    आदरणीय अब्दुल रशीद भाईजान …… आदाब ! आदरणीय विक्रमजीत जी …… सादर अभिवादन ! शुक्र है कि कमेन्ट रूपी माया से ब्लागरों को थोड़ा बहुत (बहुत ज्यादा ) प्यार है नहीं तो हालात इससे भी बुरे होते कुत्ते का कुत्ता वैरी ब्लागर का ब्लागर वैरी :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :|

    vikramjitsingh के द्वारा
    April 13, 2012

    ब्रह्मवाक्य गुरुवार………

    अब्दुल रशीद के द्वारा
    April 14, 2012

    भाई विक्रमजीत सादर प्रणाम आपके स्नेह और प्रतिक्रिया के लिए धन्यवाद आगे भी आपका स्नेह मिलता रहे ऐसी कामना करते है

    अब्दुल रशीद के द्वारा
    April 14, 2012

    बडे भाईजान सादर प्रणाम हालत कैसा होगा या है यह तो किसी से नही छुपा है मैंने तो सरोकार ढुंढने का मात्र प्रयास किया है आपका स्नेह हमे बेहतर लिखने की प्रेणा देता है.


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