आवाज़-ए-हिन्द

मेरे हिम्मत को सराहो मेरे हमराह चलो, मैंने एक दीप जलाया है हवाओं के खिलाफ.

29 Posts

410 comments

Reader Blogs are not moderated, Jagran is not responsible for the views, opinions and content posted by the readers.
blogid : 5019 postid : 155

गरीब को सपना भी नसीब नहीं

Posted On: 29 Jun, 2013 में

  • SocialTwist Tell-a-Friend

अब्दुल रशीद

सपने देखना अच्छी बात है लेकिन सपनों के लिए गहरी नींद चाहिये। नींद तब आती है जब पेट भरा हो खाली पेट किसी को नींद नहीं आती। गरीबी से बड़ी न तो कोई गाली है,भूख से बड़ी न तो कोई लाचारी है और भ्रष्टाचार से बड़ी न तो कोई बिमारी है। दुर्भाग्यवश यह सब हमारे देश में विकराल रुप लेती जा रही है और इलाज के नाम पर महज टोटका हो रहा है। बेशर्मी का यह आलम है की चुनावी वादा करते समय हमारे राजनैतिक दल इन सबको भूल जाते हैं की इस देश में गरीबी, भुखमरी और भ्रष्टाचार से जनता त्रस्त है। जिसके पास न तो भर पेट खाने को है और न ही चैन की नींद सोने कि वजह क्योंकि गरीब जनता की संतान भी भर पेट भोजन न मिलने के अभाव में कुपोषण का शिकार होती जा रही है और जन्मदाता होने के नाते सिवाय अफसोस के कुछ भी नहीं है उसके हाथ में। उनको भला लैपटॉप का क्या काम। गरीबों के इलाज का पैसा नेता डकार जाते हैं और जांच चल रही है, कुपोषण राष्ट्रीय शर्म है। क्या इन सबसे समस्या खत्म हो जाएगी। दरअसल कुपोषण की शिकार हमारे देश की राजनीति हो गई है, तभी तो अधमरे लोगों को जाति, धर्म के नाम पर बांटकर सत्ता पाना चाहती है। इनसानियत की चिता जलाकर आग ताप रहे राजनेता कैसे सत्ता के नाम पर पैसे लुटा रहे हैं यह शायद किसी से छुपा नहीं लेकिन गरीब को दो वक्त़ कि रोटी के लिए उनके पास फण्ड नहीं। यह महज इत्तेफ़ाक़ नहीं बल्कि सोंची समझी राजनीति का हिस्सा है कि अधमरे आदमी को रोटी का लालच दे कर बहकाया तो जा सकता है लेकिन स्वस्थ शरीर और स्वस्थ मानसिकता को नहीं।
देश का कोई ऐसा कानून नहीं और न ही देश में कोई ऐसी व्यवस्था है जिसके तहत झूठे घोषणापत्र जारी करने वाले राजनैतिक दल कि मान्यता रद्द कर दी जाए और झूठ बोलने वाले नेता की उम्मीदवारी रद्द कर दी जाए। बेहतर होता राजनैतिक दल भी इस तरह के गम्भीर समस्या पर विचार करते और इस समस्या का समाधान ढूढ़ने का ईमानदार प्रयास करती क्योंकि किसी भी व्यवस्था में यदि समय रहते सुधार नहीं किया जाता है तो विकृत दुर्व्यव्यवस्था के विरोध में आम जनता का गुस्सा अचानक प्रकट हो सकता है जिससे सुधार तो नहीं होता लेकिन स्थापित व्यवस्था को नुक़सान अवश्य पहुँचा देता है। उदाहरण जूते फेकना थप्पड़ मारना, क्या समस्या का समाधान है, नहीं। लेकिन सब्र का बांध टुटता जा रहा है। यह तरीका बिलकुल गलत है लेकिन हम समस्या को इस हद तक बढने से पहले ही क्यों ना हल करने का कोशिश करें। क्यों ना राजनैतिक दल अपने व अपने कार्यकर्ताओं को अनुशासन और अपने राजनैतिक विचार धारा के अनुरुप ढालने का कोशिश करती है, क्योंकि किसी भी दल के विचारधारा में न तो भ्रष्टाचार को जायज बताया जाता है और कार्यकरता के आचरण को भ्रष्टाचारी।

जरा सोच-विचार करें चुनाव के नाम पर दारू की नदियॉ और पेट्रोल का धुंआ उड़ाने के बजाए ईमानदार हो कर गरीब के झोपड़ी को रौशन किया जाता तो शायद देश का गरीब कम से कम चुनाव के नाम पर ही सही एक दिन गहरी नींद सोता और सपने देख लेता।

Rate this Article:

1 Star2 Stars3 Stars4 Stars5 Stars (1 votes, average: 5.00 out of 5)
Loading ... Loading ...

4 प्रतिक्रिया

  • SocialTwist Tell-a-Friend

Post a Comment

CAPTCHA Image
*

Reset

नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

manoranjanthakur के द्वारा
June 30, 2013

जांनकारी से भरपूर …सचेत करती …बहुत बधाई

    Abdul Rashid के द्वारा
    June 30, 2013

    स्नेह और पर्तिक्रिया के लिए शुक्रगुजार है हम आगे भी आपका स्नेह बना रहे ऐसी कामना करता हूँ

jlsingh के द्वारा
June 30, 2013

बस हमें मतदान करते वक्त ध्यान रखना चाहिए रशीद भाई कि हम किसे वोट दे रहे हैं!

    Abdul Rashid के द्वारा
    June 30, 2013

    आदरणीय जवाहर जी नमस्कार आपका प्यार और आशीर्वाद हमारे लिए अनमोल है


topic of the week



latest from jagran